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जब वॉशिंगटन और तेल अवीव, ईरान पर हमले की तैयारी कर रहे थे, मोदी ने भारत-इसराइली रणनीतिक धुरी को मजबूत करने इसराइल का दौरा किया

यह हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख Modi visits Israel to strengthen India-Israeli strategic axis, as Washington and Tel Aviv prepare assault on Iran का है जो 27 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित हुआ था।

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू (दाएं) यरुशलम में गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026 को प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करते हुए। (एपी फ़ोटो/गिल कोहेन मैगेन) [AP Photo/Gil Cohen Magen]

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी हफ़्ते इसराइल का दो दिन का दौरा किया। उन्होंने इसराइल के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी को और ऊंचाई देने के लिए इस दौरे का चुनाव ऐसे समय किया जब वॉशिंगटन और तेल अवीव, बिना उकसावे के ईरान पर हमले की तैयारी करने ही वाले थे।

मध्य पूर्व में अमेरिका ने 2003 में इराक़ पर हमले के बाद पहली बार इतनी बड़ी सैन्य ताक़त जुटाई है। ऐसे किसी युद्ध के गंभीर परिणाम हो सकते हैं और पूरे इलाक़े में तनाव बढ़ने का ख़तरा है।

इसराइल की सेना पिछले कई हफ्तों से हाई अलर्ट पर है और माना जा रहा है कि ईरान पर जंग के लिए उसे वॉशिंगटन की हरी झंडी का इंतज़ार है। इस बीच इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान के ख़िलाफ तख़्तापलट वाले युद्ध की साज़िश रचने के लिए पिछले दो महीनों में भावी फ़्यूरहर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से व्हाइट हाउस में दो बार मुलाक़ात की है। यह वही नेतन्याहू हैं जिन्हें मोदी ने गले लगाया और उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की। सभी रिपोर्टों से पता चलता है कि नेतन्याहू ट्रंप पर ईरान पर, बीते जून के 12 दिवसीय जंग से भी बड़े अमेरिकी-इसराइली हमले का दबाव डालते रहे हैं।

इस बीच नेतन्याहू और उनकी फासीवादी सरकार ने ग़ज़ा में लगातार जनसंहार को अंजाम देना जारी रखा है, बावजूद कि ट्रंप ने समझौता करा रखा है। दूसरी ओर से ग्रेटर इसराइल स्थापित करने की अपनी योजना को साकार करने के लिए वेस्ट बैंक में नस्लीय सफ़ाये के अभियान को उन्होंने तेज़ कर दिया है।

लेकिन इनमें से किसी भी बात को लेकर मोदी ज़रा भी नहीं हिचके।

वो इसराइली अपराधों के साथ खुद और भारत की एकजुटता प्रदर्शित करने तक पहुंच गए। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 के हमास के उभार की ऐसी भाषा में निंदा कि जो धुर दक्षिणपंथी समेत पूरे ज़ॉयनिस्ट सत्ता तंत्र के कानों के लिए संगीत की तरह था। उन्होंने ट्रंप के उस 'पीस प्लान' का समर्थन किया जो ट्रंप की खुद की निगरानी में ग़ज़ा को एक नव औपनिवेशिक ग़ुलामी में बदलने का प्लान है; और इस दौरान उन्होंने ग़ज़ा के लोगों के ख़िलाफ़ इसराइल के आतंकी अभियान और जनसंहार के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला। मोदी ने हमास के 'आतंकवाद' की निंदा की और भारत और इसराइल के 'साझा लोकतांत्रिक मूल्यों' की जमकर सराहना की। लेकिन इसराइली बमबारी, पूरे ग़ज़ा पट्टी की नाकेबंदी करके व्यवस्थित भूख से मारने की व्यवस्थित रणनीति और पूरे इलाक़े के ढांचे और रिहाईश को नेस्तनाबूद करने के कारण 70,000 से अधिक मारे गए ग़ज़ा फ़लस्तीनियों की मौत पर वो चुप रहे।

2017 में नरेंद्र मोदी इसराइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। और अब अपने दो दिवसीय दौरे के पहले दिन बुधवार को वह इसराइल की संसद कनेसेट को संबोधित करने वाले भी पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। वहां उनका स्वागत खड़े होकर ताली बजाते हुए किया गया, यह एक युद्ध अपराधी सरकार की ओर से, एक हिंदू वर्चस्ववादी को दिया गया सैल्यूट था जो पहली बार 2002 में तब चर्चा में आया जब वह गुजरात का मुख्यमंत्री था और उसने मुस्लिम विरोधी जनसंहार को भड़काया था जिसमें 2,000 से अधिक लोग मारे गए थे और लाखों लोग बेघर हो गए थे।

मोदी ने हमास के उभार को एक बर्बर आतंकी हमला बताया, जबकि यह उभार इसराइल द्वारा ग़ज़ा के सालों तक नाकेबंदी करके सज़ा देने के ख़िलाफ़ गुस्से के रूप में हुआ था। उन्होंने कहा, “हम आपके दर्द को महसूस करते हैं और आपके दुख में साझेदार हैं। भारत इस कठिन समय में और आगे भी इसराइल के साथ पूरी दृढ़ता के साथ मजबूती से खड़ा है।”

उन्होंने आगे कहा, 'कोई भी कारण नागरिकों की हत्या को सही नहीं ठहरा सकता। आतंकवाद को किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता।'

मोदी ने ग़ज़ा के बारे में जो कुछ भी कहा वो ट्रंप के पीस प्लान के समर्थन में कहा, जिसे उन्होंने सनकी तरीक़े से दावा किया कि यह 'तत्काल और लंबे समय के लिए शांति का वादा है।'

इस ऑरवेलियन चित्रण के अनुरूप, मोदी ने नेतन्याहू और इसराइली मिलिटरी राज्य को वास्तविक शांति स्थापित करने वालों के रूप में पेश किया। उन्होंने ट्रंप की मध्यस्थता में हुए 2020 के अब्राहम समझौतों की सराहना की, जिसे इसराइल को फ़लस्तीन सवाल पर अपने “फ़ाइनल सॉल्यूशन” लागू करने की खुली छूट देने के लिए तैयार किया गया था। मोदी ने कहा कि भारत “आपकी हिम्मत और दूरदृष्टि की सराहना करता है।”

भारत-इसराइल संबंधों की बात करते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में वॉशिंगटन के प्रमुख साझेदार और मध्य पूर्व में उसके अटैक डॉग के बीच यह “मज़बूत साझेदारी” “राष्ट्रीय हितों की सेवा करने के साथ-साथ वैश्विक स्थिरता और समृद्धि में भी योगदान देती है।”

द जेरूसलम पोस्ट इस पर बेहद उत्साहित था। “आतंकवाद” से लड़ने के नाम पर ग़ज़ा के लोगों के ख़िलाफ़ इसराइल की ढाई साल से चल रही जंग के बारे में मोदी के प्रज़ेंटेशन का ज़िक्र करते हुए उसने लिखा: ”कोई स्पष्ट भाषा नहीं. संतुलन साधने की कोई कोशिश नहीं. मूल कारण का कोई ज़िक्र नहीं. निंदा से दाएं बाएं होने के लिए कोई संतुलन साधने की कोशिश नहीं।”

नेतन्याहू ने भी, जैसा कि अपेक्षित था, मोदी की जमकर तारीफ़ की। उन्होंने इसराइल के साथ “तैयार खड़े रहने” के लिए भारत का धन्यवाद किया और फिर भारत के हिंदू वर्चस्ववादी प्रधानमंत्री को “दोस्त से अधिक, एक भाई” बताया।

मोदी की यात्रा के समापन पर दोनों देशों ने सोलह समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए और अपनी साझेदारी को उस स्तर तक बढ़ाया जिसे अब वे “शांति, इनोवेशन और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी” कह रहे हैं।

इन समझौता ज्ञापनों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा से लेकर शिक्षा, वाणिज्य और कृषि तक कई क्षेत्रों में सहयोग शामिल है। इनमें एक समझौता 50,000 भारतीय कामगारों को इसराइल लाने का भी है, ताकि अक्टूबर 2023 के बाद फ़लस्तीनी मज़दूरों पर लगे प्रतिबंधों से पैदा हुई मज़दूरों की कमी को पूरा किया जा सके।

नेतन्याहू और मोदी ने रक्षा क्षेत्र में एक अहम समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए। इसका फोकस एयरो, डेविड्स स्लिंग, आयरन डोम (कम दूरी की रॉकेट प्रणाली) और आयरन बीम (लेज़र आधारित प्रणाली) जैसे उन्नत मिसाइल रक्षा सिस्टम के सह-विकास और सह-उत्पादन पर है। यह पहले से मौजूद उस समझौते पर आधारित है जिसमें सैन्य प्रशिक्षण, अनुसंधान और विकास, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग में व्यापक भागीदारी का प्रावधान है।

इस यात्रा के दौरान किसी नए हथियार सौदे की घोषणा नहीं हुई, लेकिन हाल के वर्षों में भारत-इसराइल हथियार व्यापार में भारी विस्तार हुआ है।

अब नई दिल्ली इसराइली हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है। 2020 से 2024 के बीच इसराइल की कुल विदेशी हथियार बिक्री का एक-तिहाई भारत ने खरीदा। हाल के वर्षों में इसराइल को भारत के सैन्य निर्यात में भी तेज़ बढ़ोतरी हुई है। ग़ज़ा में नरसंहार शुरू होने के बाद से भारत ने इसराइली हथियारों का सह-उत्पादन किया है और इसराइल को लड़ाकू ड्रोन, मिसाइलें और विस्फोटक उपलब्ध कराए हैं। ग़ज़ा में इस्तेमाल की गई एआई हथियार प्रणाली भारतीय और इसराइली कंपनियों ने मिलकर विकसित की थी।

पिछले एक साल में दोनों देशों ने कुल 8.6 अरब डॉलर के सैन्य सौदे किए हैं।

मोदी की यात्रा के दौरान नई दिल्ली और तेल अवीव ने द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने के लिए मुक्त व्यापार समझौते तक पहुंचने की कोशिशों को फिर से आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई। पिछले सितंबर जब इसराइल के वित्त मंत्री और ‘ग्रेटर इसराइल’ के कट्टर समर्थक और अवैध यहूदी बस्ती में बसने वाले-फ़ासीवादी नेता बेज़ालेल स्मोट्रिच भारत आए थे, तब दोनों देशों ने अपना पहला द्विपक्षीय निवेश समझौता (बीआईए) भी साइन किया था।

ईरान के ख़िलाफ़ संभावित अमेरिका-इसराइल जंग के झटके पूरी दुनिया में महसूस होंगे। इससे भू-राजनीतिक तनाव बढ़ेगा, जंग का ख़तरा और भड़केगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचेगी। भारत, जो अपनी ज़रूरत का 80 प्रतिशत से ज़्यादा तेल आयात करता है, तेल की कीमतों में तेज़ उछाल का सामना कर सकता है। साथ ही मध्य पूर्व से आने वाली रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) में भी गिरावट आ सकती है।

ईरान लंबे समय से भारत का सहयोगी भी रहा है। नई दिल्ली ने अफ़ग़ानिस्तान और पूरे मध्य एशिया तक आर्थिक गलियारा बनाने के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास में आर्थिक और राजनीतिक पूंजी निवेश की है।

नई दिल्ली को बेशक ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इसराइल जंग के नतीजों को लेकर चिंता है। लेकिन यह चिंता इतनी नहीं है कि वह इसराइल और उससे भी अहम वॉशिंगटन के साथ अपने आर्थिक और सैन्य-सुरक्षा संबंधों का विस्तार रोक दे। इसके अलावा, वह अंतरराष्ट्रीय क़ानून के इन उल्लंघनों को अपने विस्तारवादी कदमों और महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा के लिए एक तरह के लाइसेंस के रूप में भी देखता है।

ध्यान देने वाली बात है कि पिछले मई में पाकिस्तान पर भारत के बिना उकसावे और साफ तौर पर अवैध हमले के समर्थन में इसराइल लगभग अकेला देश था जिसने खुलकर भारत का साथ दिया। इस हमले के बाद चार दिन तक हवाई और आर्टिलरी की झड़पें हुईं और दक्षिण एशिया की दोनों परमाणु ताकतें लगभग पूर्ण युद्ध की कगार पर पहुंच गईं।

पिछले पच्चीस वर्षों में बीजेपी और कांग्रेस दोनों की सरकारों के दौरान नई दिल्ली ने बार-बार तेहरान के साथ अपने संबंधों की क़ुर्बानी दी है, ताकि अमेरिका के साथ अपनी चीन-विरोधी “वैश्विक रणनीतिक साझेदारी” को आगे बढ़ाया जा सके। इसमें ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन परियोजना को ठंडे बस्ते में डालना भी शामिल है, जो दक्षिण एशिया के इन ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच रिश्ते सुधारने का आधार बन सकती थी। इसके अलावा सन् 2000 के दशक के अंत में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के नागरिक परमाणु कार्यक्रम को ख़तरा बताने के अमेरिकी रुख़ का समर्थन करना भी शामिल है।

भारत को यह उम्मीद भी है कि मध्य पूर्व में आक्रामकता, जंग और जनसंहार के ज़रिए अमेरिकी प्रभाव के विस्तार से उसे भी फ़ायदा होगा। खासकर वॉशिंगटन की उस पहल से जिसे भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) कहा जाता है। यह बुनियादी ढांचा परियोजना 2023 के जी-20 शिखर सम्मेलन में नई दिल्ली में शुरू की गई थी, जिसमें अमेरिका का समर्थन था और सऊदी अरब व यूएई की भागीदारी भी शामिल थी। इसका मक़सद चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का मुकाबला करना है। आईएमईसी का लक्ष्य भारत और यूरोप को जोड़ने वाला बहु-माध्यम व्यापार और परिवहन मार्ग बनाना है, जिससे परिवहन समय में 40 प्रतिशत तक कमी आने का दावा किया जाता है। इससे इसराइल और उसका हाइफ़ा बंदरगाह एक अहम केंद्र के रूप में उभर सकता है।

यह भी संयोग नहीं है कि गौतम अडानी के नेतृत्व वाला अडानी समूह, जो दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल हैं और मोदी के क़रीबी सहयोगी माने जाते हैं, इसराइल के हाइफ़ा बंदरगाह में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। लेकिन भारत-इसराइल संबंधों में अडानी समूह की भूमिका इससे कहीं आगे तक जाती है। उसके इसराइल स्थित कंपनियों के साथ तकनीक और बुनियादी ढांचे में साझेदारी है। वह एल्बिट सिस्टम्स जैसी इसराइली रक्षा कंपनियों के साथ मिलकर ड्रोन और हथियार भी बनाता है, जिन्हें इसराइल डिफेंस फ़ोर्सेज इस्तेमाल करती हैं।

मोदी की यात्रा के दौरान उनके और नेतन्याहू के बीच दिखी नज़दीकी की जड़ें विचारधारा में भी हैं। ज़ायनिज़्म और हिंदू वर्चस्ववाद के बीच लंबे समय से एक गहरी समानता देखी जाती रही है। यह धार्मिक राष्ट्रवाद और मुसलमानों के ख़िलाफ़ साझा विरोध से पोषित होती है। 1930 के दशक में हिंदुत्व के प्रमुख विचारक वी. डी. सावरकर ने भी इसे पहचाना था। उन्होंने ज़ायनिज़्म के समर्थन की अपील की थी और साथ ही “हिंदू राष्ट्र” से कहा था कि भारत के मुसलमानों के साथ वही व्यवहार किया जाए जैसा हिटलर जर्मनी के यहूदियों के साथ कर रहा था।

जैसा कि अपेक्षित था, ईरान ने मोदी की इसराइल यात्रा की कड़ी आलोचना की है। विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि भारत “फ़लस्तीनी लोगों की पीड़ा” को नज़रअंदाज़ कर रहा है। उन्होंने कहा कि मोदी ऐसे समय इसराइल गए जब ग़ज़ा में “युद्ध अपराध” हो रहे हैं। हालांकि प्रवक्ता ने सीधे तौर पर ईरान के ख़िलाफ़ संभावित जंग में इसराइल की भूमिका का ज़िक्र नहीं किया, लेकिन उन्होंने कहा कि तेहरान को “एक ऐतिहासिक मित्र” के रूप में भारत से उम्मीद थी कि वह “ज़ायनिस्ट शासन को रोकने की कोशिश करेगा, उसे इनाम नहीं देगा।”

स्टालिनवादी संसदीय दलों को छोड़कर भारत की राजनीतिक व्यवस्था और कॉरपोरेट मीडिया के भीतर से मोदी की इसराइल यात्रा और भारत-इसराइल रणनीतिक संबंधों के विस्तार की बहुत कम आलोचना हुई। जो आलोचना हुई भी, वह मुख्य रूप से इस आशंका पर केंद्रित थी कि इससे अरब खाड़ी देशों के साथ संबंध प्रभावित हो सकते हैं, न कि ग़ज़ा में जनसंहार और ईरान के ख़िलाफ़ संभावित जंग को भारत के परोक्ष समर्थन पर।

आधिकारिक विपक्षी कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता जयराम रमेश ने मोदी की यात्रा की आलोचना करते हुए कहा कि यह ऐसे समय हो रही है जब “कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में हज़ारों फ़लस्तीनियों को बेदख़ल और विस्थापित करने की प्रक्रिया तेज़ हो गई है … ग़ज़ा में नागरिकों पर इसराइल के हमले बेरहमी से जारी हैं और इसराइल व अमेरिका ईरान पर हवाई हमलों की योजना बना रहे हैं।” लेकिन यह आलोचना ग़ज़ा में इसराइल के नरसंहार के ख़िलाफ़ जनभावना, खासकर मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी के बीच, और कामकाजी लोगों के भीतर मौजूद साम्राज्यवाद-विरोधी परंपराओं को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक समर्थन हासिल करने की एक कोशिश भर थी। कांग्रेस पार्टी पूरी तरह भारत-अमेरिका गठबंधन के साथ खड़ी है और वह वॉशिंगटन की भूमिका को व्यवस्थित रूप से छिपाती रही है, जिसने पहले बाइडन और फिर ट्रंप के दौर में इसराइल को हथियार, वित्तीय सहायता और राजनीतिक समर्थन दिया, जबकि वह अक्टूबर 2023 से पूरे मध्य पूर्व में सैन्य हमलों को अंजाम देता रहा है।

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